ऋषि ज्ञान आत्मानंदजी महाराज का जन्म मरूधरा (राजस्थान) के जालोर जिले के पीथापुरा (बड़गांव) में दिनांक 30-8-1983 को माली (गहलोत) परिवार में माता सुमठी देवी की कोख से हुआ। इनके पिता का नाम उमाजी गोमाजी माली है। बचपन में मिडिल स्कूल तक की शिक्षा के बाद मुम्बई में वर्कस ठेकेदार के रूप में 20 वर्ष तक काम करते हुए सफलता यश और धन कमाया। इसी दौरान सद्गुरू स्वयं आत्मानंदगिरीजी महाराज के सम्पर्क में आये। सद्गुरूदेव के साथ लगातार सत्संग व गुरु कृपा में उनके प्रति समर्पण भाव तीव्र हो गया। सद्गुरूदेव की दिव्य दृष्टि ने अपने शिष्य की विलक्षण प्रतिभा को पहचान लिया। और इन्हें यज्ञ योग और संस्कार शिक्षा के द्वारा माँ भारती की सेवा में जीवन समर्पित करने के लिए प्रेरित किया। आज्ञाकारी शिष्य ने गुरू-इच्छा को सर्वस्व मानकर अपनी सहधर्मिणी हंसा देवी की प्रसन्नतापूर्णक सहमति प्राप्त की और अपने आप को गुरु चरणों में समर्पित कर दिया। सद्गुरू ने गद्गद् भाव हो अपने प्रिय शिष्य को गले लगाया और परम गुरूदेव स्वामी सत्यमित्रानन्दगिरीजी महाराज के पास हरिद्वार आश्रम ले गये और औपचारिक दीक्षा संपन्न करवाने का अनुरोध
किया। श्री श्री 1008 श्री स्वामी सत्यमित्रानंदगिरीजी महाराज के सानिध्य और साक्षी में दिनांक 26-06-2017 को भारत माता मंदिर हरिद्वार आश्रम में औपचारिक दीक्षा संपन्न हुई।
इनका बचपन का नाम गुमानमल है। दिनांक 27-04-2023 (गंगा सप्तमी) को महामण्डलेश्वर अवधेशानंदगिरीजी महाराज ने इनके माँ भारती और सद्गुरू के प्रति सेवा और समर्पण के भाव को देखते हुए एवं इनके श्रीमुख से प्रवाहित ज्ञान गंगा से प्रभावित हो इनका नामकरण ऋषि ज्ञान आत्मानंद किया और जीवन लक्ष्य में सफल होने का आशीर्वाद प्रदान किया।
माँ भारती के सुपुत्र स्वामीजी को भारत की वदिककालीन ऋपि परम्परा और धर्म संस्कृति का पुनःस्थापक माना जाता है।