जन्म 19 सितम्बर 1932 आगरा ब्राह्मण परिवार
29 अप्रैल 1960 अक्षय तृतीया के दिन पूज्य स्वामी कर पात्रीजी महाराज के निर्देशन में ब्रह्मचारी सत्यमित्र को ज्योर्तिमठ् भानपुरा पीठ के शंकराचार्य सदानंदगिरीजी महाराज ने सन्यास आश्रम में दीक्षित किया। मात्र 27 वर्ष की आयु में जगद्गुरू शंकराचार्य के पद पर प्रतिष्ठित किया। लेकिन जब उन्होंने नर सेवा नारायण सेवा के सूत्र को सिरोधार्य कर देश के गरीब असहाय जन-जन की सेवा और साक्षात्कार करने हेतु देश भर का भ्रमण किया तो माँ भारती की लाडली जनता की तत्कालीन स्थिति से उनका अंतरमन द्रवित हो उठा और उन्होंने सनातन धर्म के सर्वोच्च पद शंकराचार्य का त्याग कर वह एक साधारण सन्यासी की तरह देश सेवा के लिए निकल पडे.। देश के सांप्रदायिक मतभेदों और जन-जन में व्याप्त जातिगत दुरावों के कारण आमजन में कमजोर हो रहो राट्रनिष्ठा भावना को सशक्त बनाने हेतु उन्होनें अपना संपूर्ण जीवन मां भारती की सेवा में लगा दिया और इसी प्रयत्न की कड़ी में 1983 में पुण्यभूमि हरिद्वार में माँ भारती के जीवंत स्वरूप को दर्शाने वाले भारतमाता मंदिर का निर्माण कर भारतमाता मंदिर ट्रस्ट की स्थापना की जो राष्ट्रधर्म का एक समन्वित राष्ट स्तम्भ है। पूज्य स्वामीजी ने अपने जीवनकाल में 65 से अधिक देशों की यात्रा की और भारतीय जीवनशैली, संस्कार और अध्यात्म के पताका को विश्वस्तर पर पुनः स्थापित किया। विश्व में इस महापुरूष ने विवेकानंद की राष्ट्र नायक की छवि के पुनः दर्शन किए और भारत की वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को नमन किया।
1988 में समन्वय सेवा फाउन्डेशन की स्थापना कर स्वामीजी ने जन-जन में राष्ट्रभाव को जागृत करने, राष्ट्र को सशक्त और समृद्ध बनाने के लिए एक और नया प्रतिमान स्थापित किया। उनके द्वारा संस्थाओं के केंद्र देश भर में स्थापित मां भारती की सेवा में एवं सर्वेभवन्तु सुखिन के भाव को लेकर सेवारत है।/p>
सन् 2015 में स्वामी जी को पद्म भूषण पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। महामण्डलेश्वर स्वामी वेद व्यासानंदजी महाराज से उन्हें सत्यमित्र ब्रह्मवारी नाम दिया। वे हिन्दी संस्कृत और भारतीय धर्म साहित्य के प्रकान्ड विद्वान थे। आगरा विश्वविद्यालय और वाराणसी विद्यापीठ से साहित्य रत्न की औपचारिक डिग्री प्राप्त थी। वे भारतीय संत परम्परा की गौरव मूर्ति थे। संत और राजनीतिज्ञ सहित हर कोई उनका आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए उत्साहित रहते थे।
25 जून 2019 को इस राष्ट्रसेवक, संत और अध्यात्म पुरोधा महापुरूष मां भारती के आत्म स्वरूप हो उसमें समा गए। उनके ब्रह्मलीन होने पर एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया। उनके दिव्य पार्थिव शरीर को उनके निवास स्थान राघव कुटीर (हरिद्वार) में समाधि दी गई उनके प्रमुख शिष्यों में अवधेशान्द गिरीजी पीठाधिश्वर पंचदशनाम जूना अखाडा, योगीराज स्वयं आत्मानंद गिरीजी महाराज निर्वाण योग आश्रम मौहब्बत नगर सिरोही (राज.) है।