योगीराज स्वयं आत्मानंद गिरीजी महाराज सत्यमित्रानंदगिरीजी के प्रिय शिष्यों में थे। परमगुरू ने उनके शांत-सौम्य, भगवनिष्ठ एवं अन्तर्मुखीवृत्ति को पहचान कर ही उनका नामकरण किया था। वाणी से कम और कृत्ति से अधिक उपदेश देकर जनकल्याण करते हुए वह आत्मानन्द स्वरूप में लीन रहते थे।
योगीराज जी का जन्म विक्रम संवत् 1998 की वैशाख शुक्ल द्वितीय (गुरुवार) को बाडमेर जिले के खंरटिया गांव में भक्तिशील जाट परिवार में हुआ। इनके बचपन का नाम खेमाराम, इनके पिताजी का नाम श्री विसना राम जी एवं माताजी का नाम श्रीमति रमूदेवी था, यह जाट कुल किशान परिवार र्धम संस्कारों से औतप्रोत एवं भक्तिभाव युक्त संतोषी स्वभाव वाला परिवार था। योगीराज जी के पिताजी प्रायः सत्संग में जाया करते थे और अपने पुत्र खेमाराम को भी साथ ले जाते थे।
बचपन से ही सत्संग और गौ सेवा कार्य में रहने से बने संस्कारों ने बालक खेमाराम को अध्यात्म पथ पर प्रवृत्त कर दिया। वे बाल ब्रह्मचारी रहकर साधना करना चाहते थे लेकिन माता पिता की भावना और इच्छा का आदर करते हुए उन्होंने गृहस्थी जीवन को अंगीकार कर लिया। उसी दौरान उनका समागम संत पूनमारामजी से हुआ और उनके उपदेशों और जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी की भावना से प्रेरित होकर मां भारती की सेवा के लिए भारतीय थल सेना में भरती हो गए। आप एक कुशल और राष्ट्रभक्त सैनिक के रूप में कई वर्ष तक सैनिक सेवा में रहे, इसी दौरान सन 1965 के भारत पाक युद्ध में भी मोर्चे पर सक्रिय डटे रहे। कुछ समय के लिए भारत चीन सीमा पर भी तैनात रहे। एक सैनिक के रूप में सेवारत रहते हुए भी योगीराज जी निरन्तर आत्मसंगत में रहे लेकिन वैराग्य स्वभाव के होने के कारण सेना सेवा का खान-पान उनके लिए असहज रहता था। इसी कारण वे सैनिक सेवा से कार्यमुक्त होकर अपने गांव लौट आये और ईश्वर भक्ति के साथ खेती किसानी में लग गए। अन्तर्मन को सदैव प्रभुचरणों में लीन रखकर अपना दैनिक कार्य और जीवन निर्वाह करते हुए उनका जीवन बीत रहा था कि उन्होंने अपनी अन्तर आत्मा में ईश्वरीय ज्ञान को अनुभव किया। इस अनुभव में उन्होंने आत्मध्यान के दौरान कईबार गृहस्थी संत श्री लिखमीदासजी महाराज, पिंगल कविराज श्री रूपारामजी महाराज और नानक संप्रदाय के संत श्री हरजीरामजी से उनका आत्मिक समागम होने लगा। उसी दौरान गांव में बरसात हुई और फसल बुवाई का कार्य आया लेकिन तत्समय ही उत्तम आश्रम कागा मार्ग जोधपुर से सत्संग का निमंत्रण आया और वे सत्संग में भाग लेने के लिए जोधपुर आश्रम पहुँच गए। कई दिनों तक सत्संग में रहने के उपरांत जब वे गांव पहुँचे तो जमीन सुख चुकी थी और उनका खेत बिना बुवाई के खाली रह गया था। लेकिन उसी समय चमत्कार हो गया और बिना बुवाई के सुखी जमीन से उनके पूरे खेत में धान के अंकुर मुस्कुरा रहे थे। फसल बढ़ने लगी और इसे देखकर उनके परिवार और गांव के लोग दंग रह गए। इस घटना ने योगीराजजी का ईश्वर की ओर विश्वाश और सांसारिक वैराग्य इतना बढ़ गया कि उन्होने बाल ब्रह्मचारी संत पुरखरामजी महाराज से वानप्रस्थ दीक्षा धारण कर ली। आपका वानप्रस्थी नाम श्री सरस्वती चैतन्य रखा गया। वानप्रस्थ जीवन में आप ने योग साधना के साथ साथ कई प्रान्तों और तीर्थों की यात्राएं की तथा गांव-गांव, घर-घर जाकर योग का प्रचार किया। एक बार समागम महान् तपस्वी सन्यासी श्री विशुद्धानन्दजी महाराज कोलायत बीकानेर से हुआ। उनकी प्रेरणा से आप ने पुरखारामजी महाराज स आज्ञा लेकर 1986 के हरिद्वार कुम्भ मेले में पधारे, जहाँ आपका समागम भारतमाता मंदिर (सप्तसरोवर हरिद्वार) के संस्थापक श्री श्री 1008 श्री निवृतमान जगद्गुरू शंकराचार्य महामण्डलेश्वर शंकर के साक्षात् स्वरूप स्वामी सत्यमित्यानंद जी महाराज से हुआ और उन्होंने आपको सन्यास दोक्षा प्रदान कर अपना कृपा पात्र बना दिया। आपका सन्यासी नामकरण स्वयं आत्मानंद गिरीजी किया गया। शिव स्वरूप सद्गुरूदेव के पावन स्पर्श से आपकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो गई और साधना से आप योगीराज बन गए। परमगुरूदेव ने आपको योग प्रचार की आज्ञा दी। गुरु आज्ञा को शिरोधार्य कर आपने राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, उडिसा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, दिल्ली. उत्तराचंल आदि कई प्रांतो का भ्रमण किया और सत्संग योग प्रचार में लगे रहे।
इस दौरान मुम्बई में घर-घर सत्संग के दौरान एक जिज्ञासु युवा व्यवसायी गुमानमल का आपके प्रति दिव्य आकर्षण बढ़ गया और वह सदैव आपकी सत्संग और दर्शन हेतु लालायित रहने लगा। युवा व्यवसायी की आत्मिक प्रेम और सत्संग रूचि ने उन्हें आपका कृपा पात्र बना दिया। यह क्रम कई वर्षों तक चलता रहा। आपकी दिव्य दृष्टि ने अपने शिष्य की विलक्षण प्रतिभा को पहचान लिया और उन्हें यज्ञ योग और संस्कार शिक्षा के द्वारा माँ भारती की सेवा में जीवन समर्पित करने के लिए प्रेरित किया। आपकी दिव्य कृपा और आशीर्वाद से गुमानमल अपनी सहधर्मीणी हंसा देवी और माताश्री सुमठी देवी ओर पिता श्री उमारामजी से सहमति प्राप्त कर आपके चरणों में समर्पित हो गए।
आप परम आत्मिक संतोष के साथ अपने इस शिष्य को अपने परमगुरूदेव सत्यामित्रानंद गीरीजी महाराज के पास हरिद्वार आश्रम ले गए और इनकी औपचारिक दीक्षा का अनुरोध किया।
परमगुरू की साक्षी में 26.06.2017 को आपने अपना गुरूत्व अपने परमशिष्य में विस्तारित कर दिया।
अपने सद्गुरू के दर्शन कर भाव-विभोर होकर आप अपने आश्रम लौट आए और आगे की दिव्य यात्रा के लिए साधना में लीन हो गए। लगातार इक्कीस दिवस का मौन धारण कर 77 वर्ष की आयु में संवत् 2074 की आश्विन माह की शुक्ल त्रयोदशी तिथि 21.10.2017 को पंचतत्व शरिर छोड़ कर परमात्मा में समा गए।